इतिहास के सबसे बड़े जल – त्रासदी से गुजर रहा है भारत | निति आयोग |India facing the ‘worst water crisis in its history

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इतिहास के सबसे बड़े जल – त्रासदी से गुजर रहा है भारत | निति आयोग |India facing the ‘worst water crisis in its history

निति आयोग के रिपोर्ट और भारत के विचारको की माने तो भारत इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े जल संकट से गुजर रहा है |

इस समय लगभग 600 मिलियन लोगों को इस संकट से गुजरना पर रहा है | निति आयोग के द्वारा किये सर्वे के अनुसार 29 में से 24

राज्यों की स्तिथि भयावह है | रिपोर्ट की माने तो 2020 , बीस शहरो के भूमिगत जल भी की काफी कमी होने वाली है अगर ऐसा होता

है तो खाद्य संकट भी गहरा जायेगा क्युकी हमारे देश की 80 % खेती भूमिगत जल पर ही निर्भर करता है | गर्मी में हरों और कस्बों से नियमित रूप से पानी निकलता है क्योंकि हर घर में पाइप वाले पानी को वितरित करने के लिए बुनियादी ढांचे की कमी होती है। स्वच्छ पानी तक पहुंच की कमी से ग्रामीण इलाकों में भी बुरी तरह प्रभावित हैं। वे अनियमित बारिश के कारण भूजल पर भरोसा नहीं कर सकते हैं और तथ्य यह है कि मॉनसून बारिश में देरी या अपर्याप्त होने पर भूजल का तेजी से खेती के लिए उपयोग किया जाता है।

SOURCE GOOGLE IMAGE
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रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 200,000 भारतीय हर साल मर जाते हैं क्योंकि उनके पास स्वच्छ पानी तक पहुंच नहीं है

जैसे-जैसे शहर और कस्बों में वृद्धि होती है, शहरी जल संसाधनों पर दबाव बढ़ने की उम्मीद है – रिपोर्ट का अनुमान है कि मांग 2030 तक उपलब्ध आपूर्ति के मुकाबले दोगुनी होगी। पानी की कमी भारत के सकल घरेलू उत्पाद (सकल घरेलू उत्पाद में 6% की हानि के लिए भी होगी। )।

निति आयोग ने जल संकट से पर की गए सर्वे में राज्यों की सूचि जा की है जिसमे जिन राज्यों में जल संकट कम है उनका नाम ऊपर

रखा गया इसमें उपर से गुजरात रिपोर्ट की रैंकिंग में सबसे ऊपर है उसके बाद मध्य प्रदेश और आंध्रप्रदेश वही लिस्ट में निचे के तरह से

कमर्श : बिहार , झारखंड , उत्तर – प्रदेश , हरयाणा जैसे राज्यों के नाम है |

इस रिपोर्ट को आप निति आयोग के वेबसाइट पर भी पढ़ पाएंगे | http://www.niti.gov.in/hi

जल संरक्षण कीजिए, जल जीवन का सार!
जल न रहे यदि जगत में, जीवन है बेकार!!

UPAY JAL SANRAKSHAN KE LIYE 

1.सबको जागरूक नागरिक की तरह `जल संरक्षण´ का अभियान चलाते हुए बच्चों और महिलाओं में जागृति लानी होगी। स्नान करते समय `बाल्टी´ में जल लेकर `शावर´ या `टब´ में स्नान की तुलना में बहुत जल बचाया जा सकता है। पुरूष वर्ग ढाढ़ी बनाते समय यदि टोंटी बन्द रखे तो बहुत जल बच सकता है। रसोई में जल की बाल्टी या टब में अगर बर्तन साफ करें, तो जल की बहुत बड़ी हानि रोकी जा सकती है।

2. टॉयलेट में लगी फ्लश की टंकी में प्लास्टिक की बोतल में रेत भरकर रख देने से हर बार `एक लीटर जल´ बचाने का कारगर उपाय उत्तराखण्ड जल संस्थान ने बताया है। इस विधि का तेजी से प्रचार-प्रसार करके पूरे देश में लागू करके जल बचाया जा सकता है।


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3. पहले गाँवों, कस्बों और नगरों की सीमा पर या कहीं नीची सतह पर तालाब अवश्य होते थे, जिनमें स्वाभाविक रूप में मानसून की वर्षा का जल एकत्रित हो जाता था। साथ ही, अनुपयोगी जल भी तालाब में जाता था, जिसे मछलियाँ और मेंढक आदि साफ करते रहते थे और तालाबों का जल पूरे गाँव के पीने, नहाने और पशुओं आदि के काम में आता था। दुर्भाग्य यह कि स्वार्थी मनुष्य ने तालाबों को पाट कर घर बना लिए और जल की आपूर्ति खुद ही बन्द कर बैठा है। जरूरी है कि गाँवों, कस्बों और नगरों में छोटे-बड़े तालाब बनाकर वर्षा जल का संरक्षण किया जाए।

4. नगरों और महानगरों में घरों की नालियों के पानी को गढ्ढे बना कर एकत्र किया जाए और पेड़-पौधों की सिंचाई के काम में लिया जाए, तो साफ पेयजल की बचत अवश्य की जा सकती है।

5. अगर प्रत्येक घर की छत पर ` वर्षा जल´ का भंडार करने के लिए एक या दो टंकी बनाई जाएँ और इन्हें मजबूत जाली या फिल्टर कपड़े से ढ़क दिया जाए तो हर नगर में `जल संरक्षण´ किया जा सकेगा।

6. घरों, मुहल्लों और सार्वजनिक पार्कों, स्कूलों अस्पतालों, दुकानों, मन्दिरों आदि में लगी नल की टोंटियाँ खुली या टूटी रहती हैं, तो अनजाने ही प्रतिदिन हजारों लीटर जल बेकार हो जाता है। इस बरबादी को रोकने के लिए नगर पालिका एक्ट में टोंटियों की चोरी को दण्डात्मक अपराध बनाकर, जागरूकता भी बढ़ानी होगी।

7. विज्ञान की मदद से आज समुद्र के खारे जल को पीने योग्य बनाया जा रहा है, गुजरात के द्वारिका आदि नगरों में प्रत्येक घर में `पेयजल´ के साथ-साथ घरेलू कार्यों के लिए `खारेजल´ का प्रयोग करके शुद्ध जल का संरक्षण किया जा रहा है, इसे बढ़ाया जाए।

8. गंगा और यमुना जैसी सदानीरा बड़ी नदियों की नियमित सफाई बेहद जरूरी है। नगरों और महानगरों का गन्दा पानी ऐसी नदियों में जाकर प्रदूषण बढ़ाता है, जिससे मछलियाँ आदि मर जाती हैं और यह प्रदूषण लगातार बढ़ता ही चला जाता है। बड़ी नदियों के जल का शोधन करके पेयजल के रूप में प्रयोग किया जा सके, इसके लिए शासन-प्रशासन को लगातार सक्रिय रहना होगा।

9. जंगलों का कटान होने से दोहरा नुकसान हो रहा है। पहला यह कि वाष्पीकरण न होने से वर्षा नहीं हो पाती और दूसरे भूमिगत जल सूखता जाता हैं। बढ़ती जनसंख्या और औद्योगीकरण के कारण जंगल और वृक्षों के अंधाधुंध कटान से भूमि की नमी लगातार कम होती जा रही है, इसलिए वृक्षारोपण लगातार किया जाना जरूरी है।


10. पानी का `दुरूपयोग´ हर स्तर पर कानून के द्वारा, प्रचार माध्यमों से कारगर प्रचार करके और विद्यालयों में `पर्यावरण´ की ही तरह `जल संरक्षण´ विषय को अनिवार्य रूप से पढ़ा कर रोका जाना बेहद जरूरी है। अब समय आ गया है कि केन्द्रीय और राज्यों की सरकारें `जल संरक्षण´ को अनिवार्य विषय बना कर प्राथमिक से लेकर उच्च स्तर तक नई पीढ़ी को पढ़वाने का कानून बनाएँ।

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