JAY MAA DUMREJNI DEVI || सब की मन्नते पूरी होती है माँ डुमरेजनी के दरबार में

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DUMREJNI DEVI DUMRAO BIHAR

JAY MAA DUMREJNI DEVI || सब की मन्नते पूरी होती है माँ डुमरेजनी के दरबार में

वैसे तो सभी माँ के सभी दरबार की महिमा निराली है , ऐसा ही एक दरबार बिहार के बक्सर में है माँ डुमरेजनी का दरबार |माता यंहा आने वाली सभी भक्तों की मुराद पूरा करती है |इस से पहले की हम

आपको दरबार के  महिमा के बारे में बताये हम आपको पहले बता देते है आप यंहा कैसे पहुच सकते है | इसके लिए आप पहले बिहार के बक्सर railway स्टेशन पहुचे वंहा से महज 30 किलो मीटर की दुरी पर है माँ डुमरेजनी का पवन दरबार आप के सुविधा के लिए हम google मैप अटैच्ड कर रहा हूँ ताकि कभी आप यंहा आये तो आपको कोई समस्या न हो दरबार तक पहुचने में |

WAY TO REACHED DUMREJANI MANDIR BUXAR , BIHAR





चलिए अब बात करते है इस डुमरेजनी देवी के दरबार की महिमा के बारे में |

ऐसी मान्यता है की मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है। भस्म हुई माता की राख और मिट्टी का ढेर है। मिट्टी की पिंडी की लोग आराधना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि यदि कोई दिल से माता से कुछ मांगे, तो उसकी मुरादें पूरी होती हैं। आज भी मंदिर घने पेड़ों से घिरा है और आबादी से अलग है। फिर भी हर दिन लोग यहां पूजा अर्चना के लिए आते हैं।

स्तीत्व के लिए भस्म हुई थी माता: लगभग पांच सौ वर्ष पहले डुमरांव घने जंगलों से घिरा हुआ था। उस वक्त सड़कें नहीं थी। काव नदी और जंगलों के बीच से रास्ता भोजपुर घाट होते हुए उतरप्रदेश को जोड़ता था। इसी रास्ते पर चेरो जाति का किला था। चेरों का इस इलाके में आतंक था। लूटमार उनका पेशा है। डुमरांव प्रखंड के अरैला गांव के कौशिक गोत्रीय ब्रह्मण परिवार में डुमरेजनी का जन्म हुआ था। उनकी शादी यूपी के द्रोणवार ब्रह्मण रामचंद्र पांडेय से हुई थी। बिदाई कराकर रामचंद्र घोडे पर होकर इसी रास्ते से गुजर रहे थे। पीछे डुमरेजनी की डोली चल रही थी। जैसे ही चेरो के इलाके में पहुंचे। चेरों ने लूट की नीयत से हमला बोल दिया। पति के साथ डुमरेजनी भी चंडी का रुप धारण कर भिड़ गईं। पति के गिरते ही डुमरेजनी का हौंसला जवाब देने लगा। डुमरेजनी स्तीत्व की रक्षा के लिए अपने आप को भस्म कर लिया। नारी शक्ति का यह रुप लोगों के बीच चर्चा का केंद्र बन गया।

समय के साथ दिखने लगा प्रभाव: कुछ समय बाद माता का प्रभाव इलाके में दिखने लगा। चेरो का सम्राज्य भी माता की कुदृष्टि के कारण खत्म हो गया। 19 वीं सदी के उतराद्ध में दक्षिण टोला के कुछ लोगों के प्रयास से पूजा अर्चना शुरू हुई। पहले माता का छोटा मंदिर बना। लोगों का मंदिर में आना जाना शुरू हुआ। लोगों में माता के प्रति आस्था बढ़ती गई। माता की कृपा से रीवा नरेश रमण सिंह को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। संतान के रुप में मनौती पूरा होने पर 1898 में महारानी ने भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। उसके बाद से आस्था जो जन सैलाब उमडा,उसका कदमताल आज भी जारी है। श्रावणी पूर्णिमा को होती है विशेष पूजा: समय के साथ चेरो का आतंक खत्म हो गया। चेरो जाति के लोगों के किले का अवशेष भी मंदिर के समीप है। अब घने जंगल नहीं है। लेकिन घने पेड़ों के कारण जंगल होने का अहसास होता है। मंदिर के पूरब से काव नदी गुजरती है। श्रावणी पूर्णिमा के दिन प्रतिवर्ष यहां विशेष पूजा का आयोजन होता है। इस पूजा में अलग-अलग प्रदेशों से भक्त पहुंचते हैं।

मंदिर के पुजारी वीरेन्द्र मिश्रा ने बताया कि आरती सुबह सात बजे और संध्या साढ़े छह बजे नियमित रुप से होती है। उन्होंने बताया कि आरती के बाद मंदिर में ताला बंद नहीं होता है। भक्तों का कहना है कि माता सबकी दुख हरती है। कोई यहां से खाली हाथ नहीं लौटता।

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