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"कंसारी" माँ सच ही कहती थी कंसारी वाली दादी कब तक बेजान चूल्हे आग को जलाती हूँ रहुंगी एक दिन बंद हो जाएंगी मेरी "कंसारी

"कंसारी" माँ सच ही कहती थी कंसारी वाली दादी कब तक बेजान चूल्हे आग को जलाती हूँ रहुंगी एक दिन बंद हो जाएंगी मेरी "कंसारी"





भूंजा का स्थान गुजराती नमकीन ने ले लिया है, आज कल देश मे वही चल रहा हैं,

माँ :- बेटा सोहन कँहा हो
सोहन :- हाँ, माई आया
माँ : - सुन , शाम होने वाली है एक काम कर , छोटका घर के कोठी (a big box which is made from soil ) में से एक दो बाल ( cron) निकाल ला जरा दाने निकाल दू , हाँ वो सूप या मौनी (is a plate /bowl made from bamboo ) जरूर लेते आना ,

सोहन : ये लो माई, बाल और मैं मौनी भी ले आया हूँ ,
माँ : अच्छा सुन 3 बज गये है अब तो तेरे कंसारी वाली दादी में कंसारी जोर ( burn) दिया होगा,

सोहन : - हाँ माँ पिछली शनिवार को तो इस समय पर कंसारी जल रही थी , पर आप को एक बात बतानी हैं,
कंसारी वाली दादी कहती कब तक बेजान चूल्हे आग को जलाती हूँ रहुंगी एक दिन बंद हो जाएंगी मेरी "कंसारी" उम्र हो गई हैं मेरी इस चूल्हे को फूक - फूक कर साँसे भी फूलने लगी हैं, अब ज़्यादा दिन नहीं चला पाऊंगी इस कंसारी को इस 'संस्कृति 'को बहु आयी हैं वो भी पढ़ी लिखी हैं, और भूंजा का स्थान गुजरात के नमकीन ने ले लिया है, आज कल देश मे वही चल रहा हैं,




माँ : अपने बेटे को एक दम से निहारने लगी .........
आगे की कहानी आप की प्रतिक्रिया जानने के बाद

फ़ोटो साभार - सुभाष पासवान Msu Basopatti

नोट :- कंसारी जलाना एक पारंपरिक रोजगार हैं, जिसे न सिर्फ बिहार बल्कि उत्तर भारत मे साह समाज, जो कि उत्तर प्रदेश में गौर के नाम से जाना जाता है, उनका यह रोजगार लुप्त होने के कागार पर है, लुप्त होने के कागार पर हैं, वर्षो से जलती हुई , कंसारी ।

अच्छा होता कुछ नये किया जाता , इस समाज के युवा सोचते की कैसे इस रोजगार को संस्कृति को बचाया जाये मैं सोच रहा हूँ कि अलग सी चीजें बनायी जाए जो कि
मजेदार हो बिल्कुल गुजरात के नमकीन के तरह
Chandan Patel , bihar delegation




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