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Modi ji ka pakoda मोदी जी के पकौड़े वाला बयान गलत और सही है पढ़िए हमारे साथ

Modi ji ka pakoda मोदी जी के पकौड़े वाला बयान गलत और सही है पढ़िए हमारे साथ

बात जब पकोड़े की चली है तलक जाएगी, प्रधानमंत्री श्री मोदी ने एक निजी टेलीविजन इंटरव्यू में रोजगार के मुद्दे पर बोलते हुए कहां की बेरोजगार रहने से तो अच्छा है कि युवा पकोड़े का रोजगार करें, आजकल यह मुद्दा काफी बहस में पक्ष विपक्ष सब अपनी-अपनी राय रख रहे पक्ष जहां श्री मोदी को सपोर्ट कर रहा है नहीं विपक्ष इसे एक मुद्दा बनाने पर आया हुआ हैModi ji ka pakoda मोदी जी के पकौड़े वाला बयान गलत और सही है पढ़िए हमारे साथ आइए हम भी अपने विचार रखते , देखिए पकोरा बेचना कोई बुरी बात नहीं है प्रधानमंत्री के baat सही है की पकोरा बेचना एक रोजगार हो सकता है समझने की कोशिश कीजिए आखिर इस देश में रोजगार की परिभाषा क्या है? जहां तक मेरी समझ है मैं समझता हूं रोजगार सरकार द्वारा तय की गई न्यूनतम मजदूरी दर से ऊपर जो व्यक्ति किसी भी साधन से, चाहे सरकारी नौकरी ,करके प्राइवेट नौकरी, करके रिक्शा चलाकर ऑटो चलाकर या मजदूरी करके तय की गई हुई राशि से अधिक पैसे कमाता है तो उसे रोजगार कहते हैं . नाकी कोई व्यक्ति न्यूनतम मजदूरी से कम पैसे कमाता है रोजगार कहते हैं इससे रोजगार नहीं बेगार कहते हैं, आखिर मजबूरी में व्यक्ति पेट भरने के लिए कुछ ना कुछ तो करेगा ही अगर कोई व्यक्ति ₹200 की प्रतिदिन पकोड़े बेचकर अपने आप को रोजगार हो जाता है तो सो रुपए भीख मांगने वाला व्यक्ति भी रोजगार युक्त हैAlso,Read Under 19 World cup Affect on Indian cricket team


आपको बता दूं न्यूनतम मजदूरी दर वर्तमान में ₹250 से लेकर ₹322 तक अलग-अलग राज्यों में है अगर कोई व्यक्ति इससे कम पैसे कमाता है तो वह रोजगार की श्रेणी में नहीं आता है यही रोजगार की परिभाषा होता है, यह नहीं कहता कि कोई भी प्रोफेशन गलत है चाहे चाय बेचना हो, पकोरा चलना हो, रिक्शा चलाना हो , ऑटो चलाना हो, कंप्यूटर चलाना, सारे रोजगार एक समान होते हैं सबको करने के लिए व्यक्ति की अपनी अपनी योग्यता होती है और उनका अलग-अलग मजदूरी दर होता है, एक एरोप्लेन चलाने वाले व्यक्ति की मजदूरी दर की तुलना पकोड़े बेचने वाले से नहीं कर सकते, एरोप्लेन चलाने वाले व्यक्ति ने इस योग्यता के लिए कड़ी मेहनत की है और उनकी महत्वकांक्षा होगी के उनको के अनुसार मिले नाकी पकोड़े वाली सैलरी, पकोड़े वाले मैं अगर उसी हिसाब से मेहनत की है तो उनकी सैलरी एरोप्लेन चलाने वाले से ज्यादा हो सकती है हम ऐसे ही पकौड़े बेचने वाले का विवरण आपको दे रहे हैं जो कि एरोप्लेन चलाने वाले से ज्यादा कमाते हैं


आप चाहे तो इनके यहां जाकर पकोड़े का स्वाद ले सकते हैं, बात पकोड़े और चाय की नहीं है, बात है रोजगार की क्या युवाओं को उनके योग्यता अनुसार रोजगार दिलाने में सरकार सक्षम है अगर नहीं तो यह एक प्रश्न है एक गंभीर विषय है कोई व्यक्ति अगर किसी अलग प्रकार की योग्यता हासिल करता है अलग प्रकार का काम का चयन करता है, करता है तो अपना योगदान उस प्रकार देश के विकास में और खुद के विकास में नहीं दे पाएगा जितना कि वे अपने योग्यता के अनुसार प्रोफेशन को चुनते ,युवाओं को भी सोचने की जरूरत है कि प्रोफेशन सिर्फ डॉक्टर, इंजीनियर, सरकारी नौकरी, नहीं हो सकता अगर वह चाहे तो चाय, पकोरा, रिक्शा साईकिल, को भी अपना प्रोफेशन बना सकते हैं, एटलस, टाटा टी, किसी इंजीनियर डॉक्टर का नाम नहीं है बल्कि एक साइकिल और चाय से जुड़ें उधम का नाम है, अपने प्रोफेशन को किस तरह से पहचान दिलाना है, यह युवाओं को सोचना है मैं समझता हूं कि वह काफी हद तक सक्षम है सरकार को भी उन्हें उनके योग्यता के अनुसार रोजगार दिलाने का प्रयत्न करना चाहिए, योजना बनाना चाहिए , जिस तरह से सभी लोगों ने अपने-अपने विचार रखें उसी तरह से मैं चंदन कुमार , बिहार डेलीगेशन ने अपने निजी विचार रखे हैं अगर किसी व्यक्ति को हमारी बात अच्छी ना लगे तो इसके लिए अभी माफी मांगता हूं आप मेरे विचार को  मान ने के लिए बाध्य नहीं है आप भी अपने विचार स्वतंत्रतापूर्वक तुम्हारे साथ रख सकते हैं बिहार डेलीगेशन आपका आभार व्यक्त करता है



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