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गरीब बच्चों का माखौल उड़ा रहा राइट टू एजुकेशन एक्ट - RIGHT TO EDUCATION ACT

गरीब बच्चों का माखौल उड़ा रहा राइट टू एजुकेशन एक्ट
बगहा के नरैनापुर में संचालित आर्यभट्ट पब्लिक स्कूल। विद्यालय की कक्षाएं समाप्त हो चुकी हैं। बच्चे घर निकल रहे हैं। इस विद्यालय में 25 फीसदी गरीब बच्चे पढ़ते हैं।

गरीब बच्चों का माखौल उड़ा रहा राइट टू एजुकेशन एक्ट - RIGHT TO EDUCATION ACT

RIGHT TO EDUCATION ACT : बगहा के नरैनापुर में संचालित आर्यभट्ट पब्लिक स्कूल (ARYABHATTA PUBLIC SCHOOL । विद्यालय की कक्षाएं समाप्त हो चुकी हैं। बच्चे घर निकल रहे हैं। इस विद्यालय में 25 फीसदी गरीब बच्चे पढ़ते हैं। द राइट आफ चिल्ड्रेन टू फ्री एण्ड कम्पल्सरी एजुकेशन एक्ट 2009 की बाध्यता है। बच्चों का नामांकन तो है, लेकिन सभी बच्चे प्रतिदिन विद्यालय नहीं आते। सरकार ने बच्चों के नामांकन की बाध्यता तो लागू की है, लेकिन बाकि व्यवस्था अभिभावक को ही करनी होगी। सो, कई बच्चों ने नामांकन के बाद स्कूल जाना छोड़ दिया है। विद्यालय के ट्रस्टी मनोज कुमार ¨सह बताते हैं कि नर्सरी कक्षा में 40 बच्चों का नामांकन है। जिसमें 10 आरटीइ के तहत पढ़ाई कर रहे हैं। उन्हें किताबें भी दी जा रही हैं।



इस विद्यालय से ठीक सटे सन राइज पब्लिक स्कूल है। इस विद्यालय के शिक्षकों का कहना है कि पुरानी किताबें नहीं चलती हैं। हालांकि निदेशक आनंद कुमार ¨सह इससे इंकार करते हैं। फिर भी सेशन बदलते ही हर बच्चे को नई किताब खरीदनी पड़ती है। व्यावसायीकरण के इस दौर में इस विद्यालय में भी राइट टू एजुकेशन एक्ट का अनुपालन हो रहा है। निदेशक श्री ¨सह का कहना है कि आरटीइ के तहत 25 फीसदी बच्चों का मुफ्त नामांकन सिर्फ प्राइमरी कक्षा में लेना है। बाकि कक्षाओं में इसकी बाध्यता नहीं है। बीते साल 26 बच्चों का नामांकन नर्सरी क्लास में हुआ था, जिसमें छह बच्चों का मुफ्त नामांकन किया गया था। इन बच्चों को किताबें भी मुहैया कराई जाती हैं। आक्सफोर्ड पब्लिक स्कूल, सिटी मांटेसरी पब्लिक स्कूल, मार्निंग रोज, सन फ्लावर चिल्ड्रेन एकेडमी, एमएवाइ पब्लिक स्कूल समेत नगर में संचालित करीब करीब सभी विद्यालयों में कागजी तौर पर आरटीइ का तो शतप्रतिशत अनुपालन हो रहा है। लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि राइट टू एजुकेशन एक्ट गरीब बच्चों का माखौल उड़ा रहा है। बच्चे विद्यालय के परिवेश में ढल नहीं पाते। बाकि बच्चों का उनके साथ व्यवहार ठीक नहीं रहता। टिफिन और महंगी पठन सामग्री की व्यवस्था करना भी उनके वश की बात नहीं। सो, बच्चे महंगे प्राइवेट कान्वेंट स्कूलों में खुद को ढाल नहीं पाते।

कानून के अनुसार सभी निजी विद्यालयों में गरीब बच्चों का कम से कम 25 फीसदी नामांकन प्रारंभिक कक्षाओं में होना चाहिए। इन बच्चों के शिक्षा पर होने वाले खर्च का वहन सरकार अपने स्तर से करती है। आरटीइ का अनुपालन नहीं करने वाले विद्यालय प्रबंधनों पर कार्रवाई का प्रावधान है। लेकिन हद की बात यह है कि शिक्षा महकमे के अधिकारी सिर्फ कागजी खानापूर्ति करते हैं। विद्यालयों में आरटीइ का अनुपालन हो रहा है या नहीं, इससे उन्हें कोई खास वास्ता नहीं। अधिकारी कहते है कि
प्राइवेट स्कूलों से हर साल नामांकन से जुड़ी रिपोर्ट मांगी जाती है। इसका अनुपालन भी होता है।

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