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बिहार के दास बंधुओं के डिजाइनर जूते पहन उषा उत्थुप करती हैं स्टेज शो


ये जूते कोलकाता वाले...। ये साड़ी मद्रासवाली...। ये दिल है हिन्दुस्तानी...। हैदराबाद के एक मंच पर लोकप्रिय गायिका उषा उत्थुप यह गीत गा रहीं थीं और इनकी धुनों पर मंच पर ही बिहार के दो लोग मिश्री दास और सुशील दास डिजाइनर जूते तैयार कर रहे थे। गीत समाप्त होने पर नए डिजाइन के ये जूते भी तैयार थे। पूरा हॉल तालियों के शोर में डूब गया था।
बिहार के नवादा जिले के पकड़ी बरामा प्रखंड के जुड़ी गांव के रहने वाले मिश्री व सुशील सगे भाई हैं। दोनों 25 वर्षों से कोलकाता में मोची का काम करते हैं। पिछले पांच से छह सालों से ये दोनों उषा जी के संपर्क में हैं। वह इन डिजाइनर जूतों को पहन कर नाइट क्लबों में गा रही हैं। उषा जी जब पहली बार दास भाइयों के डिजाइन किए जूते पहन कर शो करने पहुंचीं तो हर कोई पूछने लगा दीदी, कहां ली हैं ये जूते। फिर क्या था दास बंधुओं के पास लाइन लगने लगी। अब इनके तैयार डिजाइनर जूते अब सैकड़ों लोग पहन रहे हैं। 
आइडिया उषा जी का, डिजाइनर जूते तैयार करते बिहार के दो भाई
डिजाइनर जूते तैयार होने की कहानी काफी दिलचस्प है। पुराने जूते और पुरानी साड़ियों से तैयार डिजाइनर जूते का आइडिया जानी-मानी गायिका उषा उत्थुप के दिमाग में आया था। उन्हें नाइट क्लबों में घंटों बैठना पड़ता था शो के दौरान। शो में अपने जूतों को लेकर वे कुछ परेशान रहती थीं। इसी दौरान आइडिया आया कि क्यों न पुराने जूतों को नया रूप दिया जाए। बेटी अंजली ने सलाह दी कि स्नीकर (वॉक करने वाला जूता) पहनकर शो क्यों नहीं करती। फिर पुराने जूतों को पुरानी कांजीवरम साड़ी से नया लुक देने का आइडिया आया। अपने ड्राइवर बिहार के ही वैशाली जिले के लखिंदर से कहा कि कोई मोची ला दो। एक मोची लाया गया पर वह कुछ ही दिन बाद घर चला गया। बाद में नवादा जिले के मिश्री व सुशील को बुलाया। उन्हें आइडिया बताया और तैयार होने लगे डिजाइनर जूते। 
दो दिन लगता है डिजाइनर जूते तैयार होने में 
कोलकाता में पिछले दिनों बिहार के चर्चित साहित्यकार-पत्रकार विकास कुमार झा नवादा जिले के दास बंधुओं से इंक फाउंडेशन के कार्यक्रम के सिलसिले में मिले। उनसे बातचीत में दास बंधुओं ने बताया कि एक डिजाइनर जूते तैयार करने में दो दिन लग जाते हैं। इस पर करीब पांच सौ रुपए का खर्चा बैठता है। पुरानी साड़ियों के काट-काट कर पुराने जूतों पर चिपका दिया जाता है। जिससे वे एकदम नए और आकर्षक दिखने लगते हैं। लगता ही नहीं वह पुराने हैं। दोनों भाइयों को उषा जी अपने साथ हैदराबाद के एक खास शो में भी ले गयी थीं। यह मिश्री और सुशील की पहली हवाई यात्रा थी। 
हम व्यक्तिगत तौर पर भी कर सकते हैं इनका सशक्तीकरण
सत्तर के दशक में दम मारो दम गीत से सुर्खियों में आयीं उषा जी कहती हैं कि सरकार अपने स्तर से दलित कल्याण योजना चला रही है पर हम भी व्यक्तिगत तौर पर नए आइडियाज से इन्हें सहयोग कर सकते हैं। वे बताती हैं कि वे अपने हर कदम में मैं बिहार की शक्ति महसूस करती हूं। कहती हैं कि बिहार के लोग बड़े सरल, ईमानदार और मेहनती होते हैं। बस उन्हें सही मार्गदर्शन और दिशा चाहिये। यह हम उन्हें देकर उनका सशक्तीकरण कर सकते हैं। 
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