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तंगी के चलते न बन सका डॉक्टर, दिल्ली में Mr.Littiwala लिट्टी चोखा बेच अब कमाता है लाखों







ये कहानी है बिहार के देवेंद्र सिंह की. जिन्होंने पढ़ाई पूरी करने और 7 सितारा होटल में काम करने के बाद लिट्टी का बिजनेस शुरू किया. जिसकी शुरुआत दिल्ली के ही लक्ष्मी नगर से की. जो कि आज दिल्ली में 6 जगहों पर बिकती है. पेश है उसी लिट्टी वाले की कहानी. ‘साल 1992 में 10वीं पास करने के बाद मेडिकल की तैयारी में जुटा था. पांच साल तक ये सिलसिला चलता रहा. फिर एक दिन बीआईटी एग्रीकल्चर में सिलेक्शन हुआ. कॉलेज मिल रहा था बिहार का, मोतिहारी. जो मुझे जमा नहीं’. मेरा नाम देवेंद्र सिंह है और आज मैं दिल्ली में Mr.Littiwala के नाम से जाना जाता हूं.
उन दिनों (90s) मेरा लक्ष्य मेडिकल की पढ़ाई करना था. पिताजी अमीर तो नहीं लेकिन पाई-पाई जोड़कर मुझे पढ़ाकर ही दम लेने वालों में से थे. इसलिए मैंने लक्ष्य बदला और होटल मैनेजमेंट करना चुना. उम्मीद थी इसमें जल्दी और अच्छा रोजगार मिलेगा. पैसा कमाकर परिवार की हर जरूरत पूरी करुंगा. रांची से होटल मैनेजमेंट किया और 1999 में दिल्ली आया. साल 1998 में अशोका होटल में ट्रेनिंग के लिए प्लेसमेंट हुआ, जो छह महीने के लिए था. ट्रेनिंग पूरी करने के बाद रांची वापस गया. पढ़ाई पूरी की. पास होते ही कॉन्ट्रेक्ट के आधार पर काम सीखने के लिए दिल्ली का अशोका होटल दोबारा जॉइन किया. एक साल वहां काम सीखा. इसमें कॉमी का रोल मिला, जिसमें आटा गूंथने से लेकर सब्जियां काटना, रसोईघर की साफ-सफाई करना, कोयला जलाना, जैसे काम किए.
ये बात 2002 की है. एक किचन हेल्पर की तरह काम करने के बाद ताज में नौकरी लगी. वहां एक साल काम किया. पैसा अच्छा मिला तो होटल ग्रैंड हयात जॉइन किया. ये साल 2003 की बात है. सीडीपी (टेबल पर ऑर्डर लगाने वाला व्यक्ति) की तरह काम किया. डेढ़ साल ऐसे ही बीत गया. लेकिन होटल बंद हो गया. 2003 में शादी करने का फैसला लिया. शादी के बाद नौकरी विशाल मेगामार्ट में लगी. यहां मैंने पूरे भारत में करीब 55 फूड कोर्ट खोले. मोटे तौर पर समझाऊं तो विशाल मेगामार्ट में फूड कोर्ट की चैन मैंने खोली. यहां सात साल, 2010 तक काम किया. इसमें बेकरी से लेकर छोले-भटूरे, साउथ इंडियन, नॉर्थ इंडियन, चाइनीज हर तरह के खाने की दुकान खोली. और चलाया भी.
दिल्ली में बड़ी तादाद में देश के बाकी राज्यों की तरह बिहार के लोग भी रहते हैं. फिर भी वे अपने यहां का मशहूर लिट्टी चोखा खाने की बजाए साउथ इंडियन, छोले-भटूरे, चाट-पापड़ी जैसी चीजें खाते हैं. लिट्टी इतनी हेल्दी है फिर भी लोगों को दिल्ली में मिल नहीं पाती. 1999 से 2010 तक 11 सालों में बड़े-बड़े होटलों में काम किया. खूब फूड कोर्ट खोले, ठेलों के चाट-पकौड़े भी खाए लेकिन कभी-भी किसी अच्छे बड़े साफ-सुथरे रेस्त्रां के मेन्यू में मैंने लिट्टी नहीं देखी थी.
तभी जहन में बैठा लिया था देश की राजधानी दिल्ली में लिट्टी चोखा को ब्रांड बना मशहूर करुंगा. साल 2010 में नौकरी छोड़ी. तब 70 हजार तन्ख्वाह थी. पहला आउटलेट लक्ष्मी नगर में खोला. खुद के दम पर कपंनी को खड़ा किया. लोग हंसे, मजाक उड़ाया. यहां तक कि परिवार वालों ने भी साथ न दिया. पर मैंने किसी की नहीं सुनी. 45 हजार के किराए पर दुकान ली. पांच साल लक्ष्मी नगर में काम किया. इन सालों में दुकान का किराया दोगुना यानी 90 हजार हो चुका था. सालभर में काम जमने लगा था. सभी से सराहना मिली. परिवार ने खुली बांहों से स्वागत किया. जिस लिट्टी का काम करने के लिए परिवार ने मुझे लगभग बेदखल कर दिया था. उसी लिट्टी से नाम, शौहरत, पैसा इज्जत, सब मिला. लिट्टी सबसे ज्यादा नवंबर में बिकती है. एक सीजन में 10 लाख के करीब कमा लेता हूं. मई, जून और जुलाई, तीन महीने लिट्टी का कारोबार कम रहता है.
ग्राहक मेरी लिट्टी पर विश्वास रखते हैं. लिट्टी का सत्तू बिहार से ही मंगाता हूं, ताकि मिट्टी की सौगंध उसमें शामिल रहे. कोयले पर बनाता हूं. क्वॉलिटी के साथ कोई भी समझौता नहीं करता. मेरी दुकान चलने के बाद बहुत-सी कंपनियां आईं. लिट्टी में चिकन, मटन, कीमा, पनीर, चाउमीन सब भरकर परोसा लेकिन नहीं चला. उल्टे पैर वापस चली गईं. और देवेंद्र सिंह की दिल्ली में मौजूद लिट्टी के 6 ठिकानों की बात करें तो वे प्रीत विहार डीडीए मार्केट, आनंद विहार रेलवे स्टेशन, लाजपत नगर सेट्रल मार्केट, लक्ष्मी नमग, बिहार निवास, निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन तक पहुंचता है. क्वॉलिटी सभी लिट्टी की एक जैसी रहे इसलिए बेस किचन प्रीत विहार में है.
स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद लिट्टी, कैसे
लिट्टी, रिफाइंड में नहीं बनती और न ही ये तली हुई कोई चीज है. शरीर पर इसका कोई साइड इफैक्ट नहीं है. इससे बीपी, शुगर और पेट, तीनों चीजें स्वस्थ रहती हैं. सत्तू में इंसुलिन मात्रा काफी होती है, लिट्टी खाने से शरीर को कई फायदे मिलते हैं. पेट साफ होता है.
SOURCE APNA BIHAR

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