आप भी अपना विज्ञापन यंहा दिखा सकते है सिर्फ 500/-M में कॉल करे 9811695067






Breaking News

आप हमारे ब्लॉग पर बिहार से जुड़े खबर पढ़ सकते है !, आप भी हमें खबर भेज सकते है !| आप इस ब्लॉग पर अपने विचार स्वतंत्र रूप से रखे हम पाठको के साथ शेयर करेंगे ।

BIRSA MUNDA JYANTI || आदिवासियों के लिए आखिर क्यों भगवान हैं बिरसा मुंडा?

BIRSA MUNDA JYANTI || आदिवासियों के लिए आखिर क्यों भगवान हैं बिरसा मुंडा?

देश में कई स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानी को इतिहास के पन्नों ने धूमिल कर दिया है। जब इसके ऊपर पड़ी धूल को साफ किया जाता है तो भूले-बसरे क्रांतिकारियों को याद किया जाता है। इसी क्रम में आज भगवान बिरसा मुंडा को याद किया जा रहा है। आजादी के आंदोलन में खुद को झोंक देने वाले बिरसा मुंडा के नाम से तो कई लोग परिचित भी नहीं है। इसे विडंबना कहें या फिर नियति, जिस सेनानी ने अपना जीवन लोगों की भलाई के लिए समर्पित कर दिया, लोग आज उन्हें भूल चुके हैं।
15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती मनाई जाती है और उनके संघर्षों पर फिर से पर्दा हटाया जाता है। झारखंड के आदिवासियों के लिए क्रांति करने और इसके बीज बोए जाने को लेकर उन्हें याद किया जाता है। सभी आदिवासियों के लिए वे ‘धरती आबा’ यानि ‘धरती पिता’ माने जाते हैं। उन्हें आदिवासियों ने भगवान की उपाधि दी है।
इंडियन फारेस्ट एक्ट 1882 के खिलाफ धरती आबा ने आवाज उठाई थी। अंग्रेजो के शासन में इस एक्ट को पारित किया गया था। आदिवासियों को जंगल के अधिकार से वंचित करने से संबंधित इस एक्ट के खिलाफ बिरसा मुंडा ने आंदोलन किया था।
15 नवम्बर 1875 को झारखंड के रांची जिले में उलिहातु गाँव में जन्मे बिरसा ने उलगुलान (जल-जंगल-जमीन पर दावेदारी ) के संघर्ष की अलख आदिवासियों में जगाई थी। आदिवासियों के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन न्योछावर कर दिया था, जिस वजह से उन्हें भगवान के तख्त पर बैठा दिया गया।
25 साल के अपने इस छोटे से जीवन में उन्होंने इतने मुकाम हासिल किये कि हमारा इतिहास सदैव इनका कर्जदार रहेगा।
आदिवासी साहित्यकार हरीराम मीणा की लिखी कविता में उनका अक्स काफी साफ तौर पर नजर आता है।

मैं केवल देह नहीं
मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूँ
पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं
मैं भी मर नहीं सकता
मुझे कोई भी जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता
उलगुलान!
उलगुलान!! उलगुलान!!!

No comments