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Mahashivratri 2020 : जानिए उस मंदिर के बारे में जहां भगवान शिव ने सती की याद में बहाए थे आंसू

Mahashivratri 2020 : जानिए उस मंदिर के बारे में जहां भगवान शिव ने सती की याद में बहाए थे आंसू


देवों के देव माने जाते हैं महादेव...और महाशिवरात्रि( Mahashivratri 2020 ) भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। फाल्गुन के महीने की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है और महाशिवरात्रि पर श्रद्धालुओं का सैलाब देखने को मिलता है। शिव मंदिरों में सुबह से ही भगवान भोलेनाथ के दर्शनों के लिए भीड़ उमड़ना शुरू हो जाती है। वैसे ज्योतिष शास्त्र में साधना के लिए तीन रात्रि विशेष मानी गई हैं। इनमें शरद पूर्णिमा को मोहरात्रि, दीपावली को कालरात्रि और महाशिवरात्रि को सिद्ध रात्रि कहा जाता है और महाशिवरात्रि को दुनिया के कोने-कोने में हिंदू धर्म के लोग बेहद श्रद्धा और आस्था के साथ मानते हैं। शिव के प्रति ऐसी आस्था और समर्पण भारत में ही नहीं पड़ोसी देश पाकिस्तान (Pakistan) में भी देखने को मिलता है। भई, वहां भी अनेक हिंदू मंदिर है, जिसमें कटसराज मंदिर का इतिहास बेहद खास है। इस मंदिर को लेकर भी बड़ी धार्मिक मान्यता है।

आइये आपको बताते हैं कि आखिर पाकिस्तान के इस कटसराज मंदिर(Katasraj Temple) को लेकर क्या हैं धार्मिक मान्यताएं और इस मंदिर से क्या जुड़ा इतिहास क्या है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह वही मंदिर है जहां पहली बार देवी सती की मत्यु के बाद भगवान शिव ने उन्हें याद करते हुए आंसू बहाए थे. कटसराज का यह शिव मंदिर पाकिस्तान के चकवाल गांव से लगभग 40 कि.मी. की दूरी पर कटस नामक स्थान में एक पहाड़ी पर है. यह ऐतिहासिक मंदिर लगभग 900 साल पुराना बताया जाता है. खास बात यह है कि पाकिस्तान में रहने वाले सभी हिंदुओं की आस्था का यह प्रमुख केंद्र है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब माता सती ने अपने पिता दक्ष के यहां मौजूद यज्ञ कुंड में आत्मदाह किया था, तो उनके वियोग में भगवान शिव अपनी सुध-बुध खो बैठे थे. माता सती को याद करते हुए भगवान शिव की आंखों से जो आंसू टपके थे उनसे दो कुंड बन गए. जिसमें से एक कुंड का नाम कटाक्ष कुंड पड़ गया भगवान शिव के आंसुओं से जो कटाक्ष कुंड बना वो विभाजन के बाद से ही पाकिस्तान में मौजूद है. जबकि दूसरा कुंड भारत में राजस्थान के पुष्कर तीर्थ में मौजूद है. मान्यताओं के अनुसार, कटसराज मंदिर का कटाक्ष कुंड चमत्कारी पानी से भरा हुआ है. इस सरोवर में दो रंग का पानी मौजूद हैं. मंदिर में जहां पानी कम गहरा है वहां लोगों को इसका रंग हरे रंग का और गहराई में पानी का रंग नीले रंग का दिखाई देता है. महाभारत के अनुसार यह वही जल सरोवर बताया जाता है जहां पांडव अपनी प्यास बुझाने के लिए एक-एक करके आए थे. पानी के इस कुण्ड पर यक्ष का अधिकार था. पानी पीने आए जब सभी पांडव एक-एक करके बेहोश हो गए तो अंत में युधिष्ठिर ने यक्ष के सभी सवालों का सही-सही जवाब देते हुए भाइयों को जीवित करवाया था.

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