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रावण ने सीता का अपहरण किस कारण से किया था, जबकि रावण राम से भी ज्यादा ज्ञानी था और समझदार था?

रावण ने सीता का अपहरण किस कारण से किया था, जबकि रावण राम से भी ज्यादा ज्ञानी था और समझदार था?

यह रावण को ज्ञानी, समझदार, महान, वीर, पुण्यात्मा वग़ैरह साबित करने की कोई प्रतिस्पर्धा चल रही है क्या? क्या इनाम मिल रहा है?
SOURCE GOOGLE 
कोई PhD किया हुआ व्यक्ति आपके घर की स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध उठा कर ले जाए व मानसिक रूप से प्रताड़ित करता रहे, आपके उसे उसकी गलती सुधारने के अवसर देने पर भी अपनी ज़िद पर अड़ा रहे, अपने घर-परिवार को अपने अहंकार में बर्बाद कर ले, तो किस काम की होगी उसकी डिग्री व कौन उसे ज्ञानी या समझदार मानेगा? पोथियाँ पढ़कर यदि कोई मनुष्य अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मार ले तो क्या उसे समझदार कहा जाएगा? या कोई एनजीनियर या डॉक्टर यदि स्त्रियों व बच्चों पर अत्याचार करने लगे तो उसे ज्ञानी कहा जाएगा या अपराधी?
आजकल फ़ैशन ही हो गया है रावण, मेघनाद, दुर्योधन, कर्ण, शकुनि इत्यादि के कुकृत्यों को अनदेखा कर उन्हें महान, वीर या बेचारा साबित करने की कोशिश करने का। जो लोग इन्हें महान मानते हैं या दूसरों से मनवाना चाहते हैं, पहले उन्हें यह सोचना चाहिए कि अपने घर की स्त्रियों पर सीता या द्रौपदी जैसा अत्याचार करने वाले को भी वो महान कहेंगे? छुएँगे उसके पैर उसे ज्ञानी, समझदार, वीर या दानवीर कहकर? या उसके कुकृत्य के लिए बहाने बनाएँगे? कहेंगे, कि भई यह आदमी तो बहुत समझदार था, गलती मेरी बहन की थी जो ज़िंदा थी! अब जब वो ज़िंदा थी तो इसमें इस ज्ञानी का क्या अपराध जो उसे उठा ले गया! या, कि ना मेरी माँ इस गुंडे को मना करतीं, ना वो बीच बाज़ार में उन्हें परेशान करता! शब्द कड़वे हैं किंतु तनिक अपने पर लेकर सोचिए कि किसे महान बनाने के चक्कर में लगे हुए हैं।
किसी के अपने स्वार्थ के लिए भगवान की भक्ति करने से वो मनुष्य महान नहीं बन जाता। नहीं तो तपस्या तो हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, महिषासुर, रक्तबीज, अतपि, शुम्भ, सुंद-उपसुंद…सभी ने की थी। अपने स्वार्थ के लिए तो सभी भक्त बन गए थे। फिर रावण ने शिव की भक्ति की या कर्ण ने अपने यश के लिए दान किया तो वो महान कैसे हो गए? ऐसे महान लोगों की तो कलियुग में लम्बी क़तार लगी हुई है, जो मात्र अपना मनोरथ सिद्ध करने के लिए मंदिर या मज़ारों पर जाते हैं, मन्नतें माँगते हैं, इंकम टैक्स बचाने के लिए व अपना फ़ोटो समाचारपत्र में छपवाने के लिए दान करते हैं, व जब बात नहीं बनती तो कभी जन्मपत्री तो कभी टोने टोटके या तावीज़ का सहारा लेते हैं। कई तो अपना धर्म तक बदल लेते हैं अपनी क़िस्मत चमकाने की आस में। बहुत ज्ञान, समझदारी व परोपकार है भई इन सब बातों में!
सीता व द्रौपदी को कटघरे में खड़ा करके उनपर दोषारोपण करना, उनके रक्षकों को बुरा या कमज़ोर बताना व उनके ऊपर अत्याचार करने वालों का गुणगान करना यदि बहुत आनंद देता हो तो एक बार सीता व द्रौपदी के स्थान पर स्वयं को या अपने घर की माननिय स्त्री को रखकर देखें। उसके बाद रावण को ज्ञानी व कर्ण को दानवीर कहें।
कड़वे शब्दों के लिए क्षमा करें किंतु आत्ममंथन अवश्य करें।

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